केवल प्रेम ही सत्य है

प्रेम क्या है?

प्रेम, अपनी मूल परिभाषा में, निष्काम और निस्वार्थ होता है।

प्रेम का अर्थ है दिल से निकली अपने प्रियतम के लिए शुभकामनाएँ, भले ही इसमें खुद की हानि या असुविधा हो, प्रेमी तो होता है निस्वार्थ शुभचिंतक, अपनी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने प्रिय की भलाई चाहनेवाला, दिल से सिर्फ़ दुआ देनेवाला।

प्यार भौतिकता से बहुत दूर होता है। यह हमेशा स्वयं के सुख से बहुत ऊंचा होता है। अपने प्रिय के लिए इतना भरा हुआ दिल कि स्वयं के लिए कोई स्थान न रहे।

अपने बच्चे के लिए चिंतित होना। अपने साथी से जुदा होने का डर। क्या यह प्यार है या मोह?

यह मोह (अटैचमेंट) है। मोह प्रेम नहीं है। किसीके लिए मोह पराधीनता से उतपन्न होता है; जहाँ अपने आपको पूरा करने के लिए प्रियतम की जऱूरत होती है। अगर दूसरे के साथ संबंध आपको ऐसा अनुभव देता है जैसे केवल उनकी वजह से आपको जीवन अच्छा लग रहा है; जीवन में कुछ लाभ पहुँच रहा है, जैसे आपको वह उत्साहित करता है या आपको जीने का कारण देता है, आपको सुकून मिलता है, या आपको सुरक्षित महसूस कराता है, तो वह मोह है। प्रेम अंधा नही होता, मोह अंधा होता है।

प्रेम तो तब ही होता है जब आप स्वाधीन होते है, स्वतंत्र होते हैं। केवल एक स्वावलंबी, स्वयं सुरक्षित और आत्मविश्वासी व्यक्ति ही प्रिय के लिए निस्वार्थ शुभकामनाएँ दे सकता है। यदि कोई असुरक्षित या परतंत्र है, तो बदले में कुछ पाने की एक अचेतन अपेक्षा ज़रूर होती है।

  • प्रेम पूछता है: मैं आपके विकास का समर्थन कैसे कर सकता हूँ?
  • अटैचमेंट (मोह) पूछता है: यह रिश्ता मुझे कैसे पूरा करेगा?

इसके अलावा, जहां प्रेम होता है, वहां अहंकार नहीं होता, क्योंकि अहंकार निस्वार्थ नहीं हो सकता। अहंकार स्वाभाविक रूप से स्वार्थी ही होता है।

सच्चा प्यार तो अपने बच्चे, माता-पिता, भाई-बहन, साथी, मित्र या किसी भी अजनबी के प्रति हो सकता है; आप प्रकृती से या भगवान से भी प्रेम कर सकते हैं। जब आप शुद्ध प्रेम में होते हैं, तब ये चार गुण मौजूद रहेंगे:

1. आप अपने प्रिय की उपस्थिति को जानेंगे और महसूस करेंगे। आपका मन और दिल पूर्णत: प्रिय की ओर ध्यान केंद्रित होगा, जैसे कि आप पूरी तरह से प्रिय के लिए प्रेम में मशगूल हैं।

2.  प्रिय की भावनाओं को समझना (हृदय से समवेदना होना), हृदय से हृदय तक, आत्मा से आत्मा तक जुड़ना।

3. अपने प्रियतम की प्रगति, विकास, समृद्धी की कामना करना। उनके सपनों को पूरा करने के लिए हर तरह का समर्थन देना, भले ही उसके लिए अपनी इच्छाओं का बलिदान देना पडे।

4. प्रेम के हर पल में निरंतर देना ही होता है; करुणा, अपनापन, और शुभकामनाएं स्वाभाविक रूप से दिल से प्रवाहित होते रहते हैं

यदि ये चार बातें आपसे मेल खाती हैं, तो बधाई हो—आप सच्चे प्यार का अनुभव कर रहे हैं!

प्रेम हमेशा शुद्ध होता है। तुलना, प्रतिस्पर्धा, द्वेष, जलन, क्रोध, वासनात्मकता, अधिकारिता, प्रिय के लिए निरंतर चिंता और डर, या स्वयं के स्वमान को खो देना — यह प्रेम के ना होने के संकेत हैं।

सच्चा प्यार सशक्त करता है, विजयी होता है, और हमेशा प्रगति की ओर अग्रसर रहता है!

(केवल प्रेम ही सत्य है – यह वाक्यशैली डॉ. ब्रायन वाइस, पीएलआर थेरेपिस्ट और लेखक द्वारा उद्धृत की गई है)


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